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Safarnama-Bhartiyata ki khoj mein-UK


“तुसी कि लओगे-विस्की के वोडका”

एक सपना था विश्व के सबसे पुरातन अंग्रेजी भाषी यूनिवर्सिटी में पहुँचने का, उन्हें अपने भारत के बारे में कहने का वह भी पूरा हुआ। अपना पसंदीदा विषय- कुम्भ मेला हरिद्वार का और चर्चा तीर्थ या़त्राओं की। बस और क्या चाहिए। एक बार को प्लैन स्थगित हुआ क्योंकि पापा का आपरेशन हुआ था। सब कुछ ठीक ठाक रहे, उनका मन और तन अच्छा रहे यही प्रार्थना करती मैं प्रभु के एक बंदे राघवेंद्र के सहारे घर छोड़ 11 दिवस के लिए यू के गई। दो लोगों ने इस ट्रिप को पूरा करने में मुख्य भूमिका निभाई। भगवान ने जैसे इन दोनों को चिन्हित कर दिया था मेरी हर ज़रूरत और खुशी का ख्याल रखने के लिए। सच इतनी सुखद यात्रा पहले कभी नहीं की मैंने। इस बार भी ब्रिटिश एयरवेज़ की टिकट बुक कराई गई मेरे लिए।

जाते समय बाजू की दो सीट खाली पा मुझे फिर मुझे प्रभु की अनदेखी होंद का एहसास हुआ जो पल-पल हमें गोदी में ले, इस भवसागर से पार कराती है। मेरी सीट 36डी दी गई थी किंतु न जाने कैसे मेरे मस्तिष्क को प्रभु ने 36सी की तरफ इंगित किया। मैं अपना बैग बड़े आराम से ऊपर केबिन में रख बैठ गई। फ्लाइट टेक आफ का समय हो गया लेकिन बाजु सीट के 2 पैसेंजर्स का कोई पता नहीं मेरी पिछली सीट पर भी एक महिला थी। मैंने तीन सीट पर आराम से लेट कर यात्रा शुरू की। जब खाना आता तभी मुझे उठाया जाता वरना लेटे रहो मजे  में मंत्र जपते, आह क्या ही आनंद।

इस  बार मैंने जैन मील आर्डर किया था क्योंकि पिछली बार वेज मील में भी मीट आया था हिंदु डायट में। शायद नेपाली हिंदु बस बीफ नहीं खाते बाकी सब कुछ निगल लेते हैं। मेरे लिए वैजीटेरियन मील आया। भिंडी, चना, चावल, हरी सब्जी, डेजर्ट। अरे वाह चलो यह भी ठीक है शाकाहारी है। जूस लेते समय मैंने ऐयर होस्टेस से पूछा क्या जैन मील नहीं है जो मैंने सीट बुक करते समय स्पैसीफाई किया था। उसका जवाब आया सौरी हमें कोई ऐसा निर्देश नहीं 36सी के लिए । आपकी सीट यही है न । तब मैंने ऊपर नज़र घुमाई तो डी इ जी तीनों भरी हुई थी एक सीट एफ खाली थी वो लोग भी आपस में एक सीट खाली का आनंद ले रहे थे। अगर मैं अपनी सीट पर होती तो चारों फंस के बैठते और पड़ोस की तीन सीट खाली जाती। सबकी नजरें रहती कि कौन लेटे अब हम अनजाने में ही उस आराम देय सफर को भोग रहे थे। अपने प्रभु की कृपा से।

इतनी खुशी हुई यह देखकर कि हिंदी और पंजाबी लोग कितना प्रभाव जमा चुके है ब्रिटेन में। ज्यादातर सरदारों की पगड़ियाँ और सरदारनियों  के पटियाला सलवार दिख रहे थे इस उड़ान में। मेरा भारत महान और मेरा पंजाब भी किसी से कम नहीं ।

“तुसी कि लओगे-बिस्की के वोडका। वैज कि नान वैज“। यह शब्द बार-बार मेरे कानों में गूँज रहे थे और इरिटेशन के बजाय गर्व अनुभव करा रहे थे भारतीयों के छा जाने का। मैंने खूब चाकलेटस, डेटस, बिस्किटस और ओशन नटस लिए अपने साथियों के लिए जिन्हे भारत आकर टेस्ट कराना था मुझे।

पब्लिक टैलीफोन बूथ लाल रंग के पेंट से सुसज्जित, जो सिर्फ इंग्लैंड में ही दिखे मुझे

लंडन हीथरो पहुँच कर मैंने अपना मैक्स सिम कार्ड मोबाइल आन किया। अपनी बेटी सरबजीत को बताया कि प्लेन लैंड कर गया। पहली बार यह मैक्स मैं ले गई थी इंडिया से जिसका इतना फायदा होगा यह अनुमान नहीं था। गलती से मेरी सहेली, बेटी, स्टूडैंट थ्री-इन-वन, सरबजीत अपने भाई के साथ टर्मिनल 3 पर इंतजार कर रही थी जबकि हम टर्मिनल 5 पर पहुँचें थे। उसे टिकट देखने में गलती लगी थी और बिना इस फोन के हमें काफी मुश्किल का सामना करना पड़ता एक दूसरे को ढूँढने में। वाह प्रभु तेरी मौज के क्या कहने। कुछ होने से पहले ही इंतज़ाम कर देता है।

एक और अचंभा उसकी कृपा का नमूना। सरबजीत की सास ने कुछ तेल की शीशी मंगाई थी जो रिस्क की वजह से नहीं ले गई थी। हम सब ने मिलकर बहाना सोचा था कि हीथरो पर चैकिंग के दौरान डाग स्क्वैड ने सूंघ लिया और हमारा बैग पूरा खुलवाया।

पर यह क्या । यहाँ तो कोई चैक करने वाला ही नहीं । बैगेज क्लेम कर सीधा एक्जिट नथिंग टू डिक्लेयर बोर्ड पढ़ा और कोई चैकिंग ही नहीं हुई। हुर्रे —- बड़े आराम से बाहर आ सरबजीत का इंतजार करने लगी। एक दूसरे से मिलते ही ऐसा हुआ मानों बरसों के बिछड़े अब मिले। मरसीडीज़ में हम दोनों कोवैंट्री में उसके घर की ओर रवाना हुए ।घर जाकर हल्के मुँह से झूठ बोला “सौरी आंटी तेल नहीं पहुँचा पाए, सब खुलवा लिया था”।

ग्रेट ब्रिटेन का एक मात्र रामकृष्ण वेदान्ता सैंटर जो रामकृष्ण आर्डर से जुडा़ है

वेदान्ता सैंटर में स्वामीजी का सन्निघ्यः

कैसे ठाकुर राम कृश्ण परमहंस अपने समय में भक्तों से वार्तालाप करते होंगे। डेढ़ घंटा कार के सफर के बाद मै और  सर्बजीत बोरन एैंड विलेज पहुँचे। कार में गंतव्य स्थल का पता फीड कर दिया था। हर मोड़ पर स्पीकर बताई जा रही थी अब कौन सा एग्ज़िट आएगा, कहाँ मुड़ना है। तब मेरे लिए ऐसी कार की कल्पना किसी अचम्भे से काम नहीं था पर आज ठाकुर कृपा से ऐसी कार मुझे दी गयी है जिसके सारे कंट्रोल्स स्टीयरिंग में हैं।  मेरा भारत तरक्की पर है साहिब ।

जैसे ही पहुँचे उस सुंदर से भवन में, ठाकुर की समाधि वाली मुद्रा वाला फोटो। मेरे आंखों से अश्रुधारा बह निकली। एक ब्रहृमचारी आए जिन्हें हमने अपना नाम बताया और फिर मंदिर में प्रणाम करने गए। कितना सुकून था, जैसे अपने घर आ गई मैं और यह सुकून और भी उल्लास में बदल गया जब स्वामीजी ने मुझसे पूछा कितने दिन रूकोगी। मैंने कहा आज तो वापिस जाऊँगी लेकिन 16 को फिर आकर रहना चाहूँगी, वापिसी फ्लाइट पकड़ने के लिए। बहुत खूब.  17 को सरबजीत को आफिस जाना था आडिट  मीट में । मैं अनिश्चित ही लंडन पहुँची थी कि 16 और 17 कहाँ गुजारना है और स्वामीजी ने पूरी जिम्मेदारी ली कि वे टैक्सी बुला देंगंे वापिसी या़त्रा के लिए एयरपोर्ट तक।

वेदांता सैंटर के हैड स्वामी दयात्मानंद के साथ

स्वामीजी ज्ञान बांटते जा रहे थे और मैं पेपर पैन न पास में होने का गम कर रही थी। एक-2 शब्द अमूल्य था। विट्टी हयूमर से भरे हुए जोक पर जोक कह रहे थे ताकि इंटरस्ट बना रहे। सरबजीत के जैसे सारे प्रश्नों का उत्तर मिल गया था। उसे आनंदित देख मेरा मन फूला नहीं समा रहा था। वहाँ से फ्री बुक्स ले हम घर लौट आए। आशीर्वाद मिल गया था अब कान्फ्रैंस की कोई चिंता नहीं थी। अगले दिन कोवैंट्री से आक्सफर्ड के लिए ट्रेन ले ली। सर्बजीत के कारन ही मैं इस सेंटर तक पहुँच पाई थी. प्रभु उसे सदा खुश रखे

आक्सफोर्ड नहीं आक्सफर्ड

दौड़ो, भागो, हमें ट्रेन कैच करनी है । डैड रैम्बो ( कुत्ते ) को घुमाकर लौटे नहीं, हम लेट हो जाएंगे। अगली  ट्रेन लेनी पड़गी, ओह। सरबजीत इस उधेड़ बुन में थी। अपनी काफी का कप ट्रेन में ही लेना था उसे । क्या कार ले जा वहाँ पार्क करें ..इन्हीं सब सवालों के बीच अचानक उसके डैडी आ गए। आह। उसकी सास ने बोला “रैम्बो का खाना तो डाल दो। अरे नही, हमें जाना है पहले ही लेट । भागो और इस तरह हमने कोवैंट्री से कार में बैठे रास्ते में शब्द वाणी विचार 8 मिनट सुना और ट्रेन स्टेशन के लिए सीढ़ी पार की। टिकट लिया।

अरे कहीं ट्रेन जल्दी चली गई , अभी तो दो मिनट है, ऐसा कैसे ? सरबजीत की परेशानी देख मैं महामृत्युंजय मंत्र पढ़ने लगी। नहीं- अभी ट्रेन के आने में 9 मिनट थे। हम जल्दी आए थे। वह हमेशा 1 मिनट या 2 मिनट पहले ही रोज़ ट्रेन पकड़ती थी। आज तो कमाल हो गया था इसलिए वह हैरान थी। वापिसी के लिए भी मुझे दिशा निर्देश दे रही थी। आक्सफर्ड स्टेशन पहुँच उसने मुझे ब्रेकफास्ट ले दिया और आधा घंटा बिता वो दूसरी ट्रेन में चली गई और मै टैक्सी में आक्सफर्ड । आंखों को विश्वास नहीं हो रहा था यह वाकई आक्सफर्ड शहर या आक्सफार्ड यूनिवर्सटी है जिसके बारे में स्कूल में एक कहानी में पढ़ा था ।

आक्सफोर्ड नहीं आक्सफर्ड – इंडियन और ब्रिटिश एक्सैंट का फर्क उस कहानी में जिक्र आया था, जब टिपिकल भारतीय ऐक्सैंट का मज़ाक उड़ाया गया था उस लेखक ने। हाँ मैं उसी शहर में थी। कहानी में ।कार में से ही फोटो खींचा। सच पूछो तो अभी तक यही जानती थी कि आक्सर्फड यूनिवार्सिटी का नाम है। वहाँ पता चला आक्सफर्ड county है(शहर) है और कालेजों का समूह आक्सफर्ड विश्वविद्यालय है।  नज़र मीटर पर कि पैदल का रास्ता 20 मिनट है तो टैक्सी में कम लगना चाहिए। यह रैडलाइट इतनी क्यों आ रही है? खैर, 7 पाऊंड में पहुँच गई मैन्स फील्ड कालेज ।

आक्सफर्ड का मैन्सफील्ड कालेज
आक्सफर्ड ट्रेन स्टेशन जहाँ से कान्फ्रैंस स्थल जाना था

A,B,C—Z दीवार

A,B,C—Z तक चित्रित एक दीवार नुमा फ्लैक्स

रजिस्ट्रेशन तो 12:30 बजे से शुरू है बाकी लोग कहाँ हैं? पोटर्स लाज में पूछा तो पता चला डाईनिंग हाल में है। चलो हम भी कहीं चलें। वहाँ कुछ भारतीय साथी जिनसे मैं ने सम्पर्क किया था आ चुकी थीं। उन्हीं के कमरे में अपना सामान रख हम आक्सफार्ड पद यात्रा के लिए रवाना हुए। खुद ही एक्सप्लोर करना मुझे और मेरी दो अन्य साथियों का भाया, एक ने 10 पाऊंड देकर गाईड के साथ सभी भवनां और कालेजों के बारे में जानने को बेहतर पाया। तरह-तरह के सुवेनीर, टीशर्ट पर आक्सवर्ड लिखा पैन, किरिंग, कप यही सब लोग खरीद रहे थे। मैं अभी सभी का मुआयना कर रही थी क्योंकि मुझे मालूम था कि मेरी सखी सर्बजीत मुझे पिछली बार की तरह उन स्टोर्स में ले जाएगी जहाँ बेहतर चीजें कम दामों पर मिलेंगी।

बेइंतहाह टूरिस्टज़ हाप आन हाप आफ बसों द्वारा आ रहे थें। पैदल चलने वाले भी कम न थे। उस शहर में सिर्फ टैक्सी, बस और साइकिल चलने की परमिशन है। कोई कार पार्किंग नहीं है। सभी गलियों में विद्यार्थियों की भरमार है जो काफी का कप हाथ में लिए आइसक्रीम खाते हर जगह मिलते हैं। जिससे भी रास्ता पूछो वह टूरिस्ट ही निकलता। सभी फोटो खिंचवाने में उत्सुक दिखे उस विक्टोरियन आरकीटेक्चर के अद्भुत सौदर्यशाली भवनों के आगे। कैथिडरल की तो भरमार है आक्सफार्ड में । 39 काॅलेजों का यह समूह ही आक्सफर्ड विश्वविद्यालय कहलाता है। रैडक्लिफ कैमरा, म्यूज़ियम, A,B,C—Z तक चित्रित एक दीवार नुमा फ्लैक्स, बेकरी काॅफी शाप, बोर्डलियन लाइब्रेरी, यही सब वहाँ की मुख्य अैटरैक्शनस थे।

R से रागमाला

यूनिवर्सिटी कैम्पस में वाक टूअर (भ्रमण) करते हुए करते हुए म्यूजियम के सामने अंग्रेजी वर्णमाला A B C —Z तक विश्व के सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ों का वर्णन किया गया था। S से शेक्सपीयर या एच से हूक ( एक जीव ) का नाम था, A से Austen फेमस पर्सनेलिटी , सिर्फ R से अपनी भारत की छवि थी रागमाला के रूप में। उस विदेशी भूमि पर अलग-अलग देशों जीव-जन्तुओं को इस वर्णमाला की पिक्चर्स पर जगह मिली थी और उनमें मेरे नाम के अक्षर R पर ही केवल रागमाला था। इस बात का एहसास तब हुआ जब उस Picture Wall के आगे खड़े हो हम फोटो ख्ंिाचवाने लगे। मेरे नाम के अक्षर पर भारतीय रागों का चित्र। अरे वाह। बहुत गर्व महसूस हुआ। अपनी प्रैजंे़टेशन के वक्त मंैने साड़ी पहनी थी जिसे हर एक डेलीगेट ने व्यक्तिगत रूप में मेरे परिधान की सराहना की। सड़क पर चलते हुए कमरे तक पहुँच, लैक्चर के दौरान, सब जगह। अपने भारत की रिच संस्कृति पर बहुत मान महसूस होता है जब भी विदेश जाती हूँ।

गूगल पर उस तीन मंजिल लाइब्रेरी के आकर्षक भवन ने मेरी आँखों को भी लुभाया गया था । उसी को ढूँढते-ढूँढते हमने 1.30 घंटा बिता लिया था और हर मोड़ पर फोटो खींचा था, आखिरकार मिल ही गया। बस कान्फ्रैंस शुरू होने का समय भी हो चला था। मेरी साथी जो शापिंग में मशगुल थीं, उन्हें छोड़ मैं अकेली ही कालेज वापिस आ गई। कुछ देर में वो भी लौर्ट आइं और हम उस तीन दिवसीय आध्यात्मिक और एकैडमिक सफर में कूद पड़े।


हमें दूसरा दिन था उस भव्य चैपल कम डाईनिंग हाल में खाना खाने का । डिनर टेबल पर बैठे हुए अचानक हमारी कान्फ्रैंस मैनेजर नैन्सी ने एक बात पर ध्यान दिलाया। उस चैपल की दीवारों पर बेहतरीन पत्थर को तराश कर बनाए गए किन्ही संतो के नहीं अपितु उन सम्मानित लेखकों के थे जिनके लेखन कार्य को हमने बचपन से पुस्तकों में पढ़ा है। शेक्सपीयर, डांते, मिलटन इन सबके बुत्त बने थे और शीशों पर कलरड पेंटिंग थी जिनमें उनका नाम भी पेंट किया गया था । इतना सम्मान लेखन का कि लेखकों को कालेज के चैपल में इममोरटल बना दिया गया। दिल गद गद हो गया मुझे ऐसा लगाा कि लेखन का सम्मान शायद इस शहर में सबसे अघिक है। लेखकों की कृतियाँ ही उनकी पहचान होती हैं और उन्हें केा संत के रूप में इतना ऊँचा सम्मान कि पीढी दर पीढ़ी जो भी उस यूनिवर्सटी में आएंगे उनके मन मस्तिष्क में लेखकांे की छवि अंकित रहेगी।

आक्सफर्ड का सबसे मनमोहक गोलाकार डोम रैडक्लिफ कैमरा। यह 1749 में पलिब्क लाईब्रेरी के रूप में खोला गया। लैटिन भाश में कैमरा का मतलब कमरा है।

आक्सफर्ड में लेखकों का सम्मानः-

आक्सफर्ड मैन्सफील्ड कालेज के चैपल की दीवारों पर षेक्सपीयर और दांते जैसे मशहूर लेखकों की पेंटिग और बुत्त


हमें दूसरा दिन था उस भव्य चैपल कम डाईनिंग हाल में खाना खाने का । डिनर टेबल पर बैठे हुए अचानक हमारी कान्फ्रैंस मैनेजर नैन्सी ने एक बात पर ध्यान दिलाया। उस चैपल की दीवारों पर बेहतरीन पत्थर को तराश कर बनाए गए किन्ही संतो के नहीं अपितु उन सम्मानित लेखकों के थे जिनके लेखन कार्य को हमने बचपन से पुस्तकों में पढ़ा है। शेक्सपीयर, डांते, मिलटन इन सबके बुत्त बने थे और शीशों पर कलरड पेंटिंग थी जिनमें उनका नाम भी पेंट किया गया था । इतना सम्मान लेखन का कि लेखकों को कालेज के चैपल में इममोरटल बना दिया गया। दिल गद गद हो गया मुझे ऐसा लगाा कि लेखन का सम्मान शायद इस शहर में सबसे अघिक है। लेखकों की कृतियाँ ही उनकी पहचान होती हैं और उन्हें केा संत के रूप में इतना ऊँचा सम्मान कि पीढी दर पीढ़ी जो भी उस यूनिवर्सटी में आएंगे उनके मन मस्तिष्क में लेखकांे की छवि अंकित रहेगी।

मैन्सफील्ड कालेज का चैपल जहाँ 150 लोग एक साथ खा सकते हैं, यहाँ कन्सर्टस, रिसाइटल और लैक्चर भी होते

वहाँ का वुड वर्क देखते ही बनता था। वो डायस जिससे वक्ता बोेेेेेेलते हांेगे उस पर ईगल बना था। ब्रास का माईकस्टैंड सब कुछ राॅयल सा था। टेबल पर कैंडल भी वो लोग जलाते थे हालांकि 6.30 शाम डिनर के समय सूर्य खूब तेज़ चमकता था। ग्रीष्म ऋतु में इंग्लैंड में सूर्य देवता रात को 9.30 बजे तक रहते हैं और सुबह 4 बजे ही उदय हो जाते हैं। इतना लंबा दिन होने से लोग काफी काम करते है और उनकी ऊर्जा ने मुझे भी प्ररित किय कर्म बनने को।

मैन्सफीलड की अपनी ब्रियूरी में तैयार वाईन और स्पार्कलिंग वाटर

डिनर टेबल, ब्रेक फास्ट के समय बस एक ही चर्चा, क्या आपने कोई पिलग्रिमेज की। आपका विषय क्या है? आदि आदि। मेरे देश में ऐसा होता है। समय का पता ही नहीं चलता था कैसे बीत गया। ज्यादातर कैथेालिक्स थें इस गोष्ठी में। बस लैक्चर फिर काफी ब्रेक फिर लैक्चर्स फिर खाना फिर लैक्चर्स फिर काफी और अंत में डिनर यही रूटीन रही लगभग तीन दिन। यहाँ सादा पानी उपलब्ध नहीं था, या तो स्पार्कलिंग वाटर या फिर वाईन। आक्सफर्ड मैंन्सफील्ड कालेज की अपनी ब्रूअरी है जहाँ वाईन बनती और पैक होती है। ऐसा मुझे बताया गया।

प्रभु की कृपा से जैट लैग बिल्कुल नहीं था क्योंकि मैं दो दिन पूर्व इंग्लैंड आई थी। स्वस्थ मन और मस्तिष्क से इस अकैडमिक कान्फ्रैंस का हिस्सा बनी और खूब सवाल जवाब भी किए। आक्सफर्ड का अनुभव जैसे अपने आप में ही एक तीर्थ यात्रा बन गया था मेरे लिए। कुंभ मंथन में जिस तरह समुद्र मंथन कर देवताओं और असुरों ने अमृत और विष निकाला था उसी तरह हम इन तीन दिनों में आध्यात्मिक और एकैडमिक मंथन कर तीर्थ यात्राओं के महत्त्व और उपलब्धियों का मानव जीवन से तालमेल बिठाने में लगे थे।

गुरूद्वारों का हाइटेक वैज लंगर-

मुझे लगा अगर हर ऐतिहासिक शहर में यह ‘वाल’ होनी चाहिए जो वर्णमाला के जरिए उस जगह की मुख्य चीजों, हास्तियों या उपलब्धियों का ज्ञान दे। हमारे हरिद्वार में मुख्य चैराहों पर गंगा अवतरण और चार धाम के मुराल तो हैं परन्तु ‘ह’ से हर की पौडी़ न से निरंजनी अखाडा़, ब से बी एच ई एल या फिर प से पतंजलि योग पीठ दर्शाती एक ‘ वाल’ भी हो तो जो 3-4 लाख लोग रोज यहाँ आते हैं, उनके ज्ञान में वर्धन होगा।

यूनिवर्सिटी चर्च आफ सेंट मेरी द वर्जिन, कान्फ्रैंस के दौरान एक नन प्रतिभागी के साथ


हाथ में प्लेट लेकर प्ंक्ति में लगी मुझको लंगर बरता रही युवती ने कहा-दाल बिग सैक्शन में या स्माल। प्लेट में बनी कटोरियों में मैंने दाल और परशादा लिया। पर देखा पीज़ा भी लंगर में था। थोड़ा आगे बढ़ने पर जलेबी, खीर भी । वाह बाबाजी! यह तो माडर्न लंगर है। लोगों से मिलते हुए मालूम हुआ कि वीकैंड पर गुरूद्वारों में पीज़ा रहता है जिसे आसपास की यूनिवर्सटीओं में पढ़ रहे बच्चे बहुत शौक से खाते हैं। सच विदेश में अगर अच्छा खाना खाना हो तो गुरूद्वारों से बेहतर कोई जगह नहीं वरना आक्सफर्ड की तरह वैज के नाम पर मटर पुलाव के ऊपर अंडा सजा कर दिया जाता है। पाठ सुनकर लंगर छककर हम घर वापिस आए और थोड़ा घर के मैंबर के लिए पैक भी करवा लाए।
इंग्लैंड ही नहीं दुनिया के किसी भी हिस्से में जाओ तो भारतीय व्यंजन गुरूद्वारो में आसानी से प्रेमपूर्वक पा सकते हैं। मुझे यह सीख मिली।

लंडन का ढिषुम रेस्तराँः-


ढिशुम -वाह क्या नाम है रेस्तराँ का। गुगल मैप पर ढूँढते, ढूँढते लंदन की पिकाडली सर्कस और कोवैंट गार्डन एरिया में एक हिन्दुस्तानी द्वारा चलाया हुआ यह बार और रेस्तराँ दुनिया भर से फूड लवर्स को अपनी ओर खींचता है। सारा खाना स्टील के बर्तनों में, पानी स्टील के गिलास में, बिरयानी पीतल की हांडी में सर्व किया जाता है हालांकि परोसने वाले अघिकतर अंग्रेज ही होते हैं। हर दीवार पर बालीवुड के पुराने कलाकारों के नाम सहित चि़त्रफ्रेम में लगे हैं मुख्यतः पुराने हीरो हीरोइन जैसे आशा पारिख, शम्मी कपूर। लक्स और फैमिना की ऐड के पुराने कवर पेज भी फ्रेम कर दीवारों पर लगाए गए है।
खुद ही एक्सपलोर करने पर जब हम अपने गंतव्य पर नही पहुँच पा रहे थे तो कौस्टा में जाकर ड्रिंक ले चार्जिेग स्टेशन पर सरबजीत ने मोबाइल चार्ज किया। फिर जी पी आर एस की मदद से उन अनगिनत रेस्तराँ और स्ट्रीटज को पारकर हम ढिशुम पहुँचे थे। भारतीय व्यंजनों की खुशबू ने बडे दिनों बाद तृप्ति दी थी। शंकराचार्य के निर्वाणनष्टकम की मनोबुद्वअहंकार चिददा्दीनाहम न च श्रोत्र जिहवे न घ््रााण नेत्रे. पंंिक्त को गाने वाली यह राधिका उस भारतीय खाने की खुशबू के आगे नतमस्तक थी। ऐसा लगा था बहुत दिन बाद जैसे आत्मा तृप्त हुई हो। सभी इंद्रियाँ ऐलर्ट हो गई थीं। आंखंे उन तस्वीरों को कैद कर रही थीं। जिहवा लस्सी का स्वाद ले रही थी और मेन कोर्स मील की प्रतीक्षा में थी। करीब एक घंटा बिता जब हम निकलने लगे तो देखा कि मोबाइल जी निगरों वेटरैस ने बार मे चार्जिंग पर लगाया था स्विच आॅन ही नहीं किया था। और हम फोन और कैमरा की डैड बैटरीज़ के साथ फिर लंदन घूमने चले। लंदन आई और बिगबैन बाकी था। सरबजीत मन ही मन गुस्सा तो हो रही थी पर स्टूडैंट होने के नाते इज़हार नहीं कर रही थी कि मैंने चार्जर साथ क्यों नहीं लिया। कैमरा का क्या फायदा जब बैटरी चार्ज नहीं। मैनें उसे सांत्वना दी कि मेरा इंडिया वाला मोबाइल फोन मुसीबत में काम आता है। पर उसकी छोटी स्क्रीन उसे रह रह कर हर फोटो शूट करते समय क्षुब्ध कर रही थी। हालांकि बाद में यह सब हमारे डोप एक्ट या ब्लौंड आर्ट की संज्ञा बन गया। फोटो अच्छी आई थी तो वह शिकवा भी जाता रहा।

हमने फ्राइड भिंडी जिसे वो ओकरा कहते हैं आर्डर की। बिल्कुल हरी लेकिन क्रिस्प मसाले वाली भिन्डी हाजिर थी। लस्सी के साथ जायकेदार लग रही थी। फिर दाल मक्खनी, बिरयानी, पनीर टिक्का का दौर शुरू हुआ । अचानक मेरी नज़र टेबल पर रखे स्पेशल कार्ड पर पड़ी । ईद के मौके पर फारसी और अंग्रंेजी में लिखा ढिशुम का ईद मिलन बयान कर रहा था ।जिसमें बहुत सारे आकर्षण षामिल थे। हाई टी के अंतर्गत बाम्बे सनैक्स शीर खुरमा और मिठाई थी, लाईव म्यूजिक गायक राकी बहादुर द्वारा, कैलिगा्रफर समीर मलिक द्वारा अपना नाम अर्बी में लिखने का प्रपोजल मनमोहक था । बच्चों के लिए आकर्षक उपहार भी थे । यह भी था उस कार्ड में We will be hand making fragrant parcels of meetha Pan (a popular Indian digestive)

लंदन आई के लिए भीड़ वैष्णों देवी से कम नहींः-

मेरी सहेली सरबजीत के साथ लंदन आई फैरिस व्हील राईड के दौरान,


प्रभु के दर्शन के लिए चाहे वह दक्षिण में तिरूमला का मंदिर हो या फिर उत्तर भारत की वैष्णो देवी का, कितनी भी लंबी पंक्ति में लगा जा सकता है। मन में भावना और श्रद्धा के बलपर, परंतु एक झूले के लिए चार घंटा पंक्ति में लगना तो मुझे गवारा नहीं था। आनलाईन टिकट बुक की हुई थी पर टिकट कलैक्शन में 15 मिनट लगे। उसके बाद जब फेरिस व्हील तक आए तो लंबी लंबी कतारें देख होश उड़ गए। ढिशुम के खाने के बाद कतार में खड़ा होने का धैर्य मुझ में नहीं था। कोई भगवत् दर्शन की प्रेरणा भी नहीं थी। इसलिए मेरी मायूसी देख सरबजीत ने ज्यादा पाऊंड देकर टिकट को अपग्रेड करा लिया जिससे हमारा नंबर 15 मिनट में ही आ गया। हाथ में क्रश ( स्ट्राबेरी ) का गिलास लिए हम गंतव्य पर बढ़ रहे थे। यहाँ पर अचानक हमारी कान्फ्रैंस में आई दो महिलाएँ भी मिली। वो तो हिम्मत हार चुकी थीं और उन्होंने कहा कि वैसे ही लौट जाएंगे, ट्राली दूर से देख ली, बस काफी है। हम दोनों ट्राली पर सवार हुए स्वामी विवेकानंद की पुस्तक की एक कविता में फैरिस व्हील का जिक्र आता है । उन्होंने उदाहरण द्वारा बताया है कि जिस तरह लोग फैरिस व्हील पर चढ़ते और उतरते रहते हैं और कुछ समय अपनी राईड का आनंद लेने का मौका उन्हें दिया जाता है। फिर समय खत्म होने पर साइकिल राऊंड पूरा होने पर उतर जाना होता है उसी तरह ज़िदगी में हमें मनुष्य चोला मिलता है ताकि हम जिन्दगी का अनुभव लेकर, उससे सीख कर परम सुख प्राप्त कर सकें, द्वंद्वों से उबर कर परम सुख एवं शांति का अनुभव कर सके और उस परम आनंद की स्थिति को अनुभूत करते हुए इस संसार सागर से पार हो जाएँ। बार-बार जन्म लेना और मरना, इस चक्र से निकलने का एक ही साधन है – मनुष्य जीवन। बाकि सभी योनियंा तो केवल भोग योनियाँ है जिनमें छुटकारा नहीं मिल सकता फिर क्यों न इस मनुष्य जीवन का भरपूर लुत्फ उठाते हुए उस एक सिर्फ एक प्रभु की प्राप्ति को ही हम अपना लक्ष्य बना लें।
टेम्स नदी पर यह लंदन आई में धूमती बंद ट्रालीज़ बहुत धीरे-धीरे पूरे शहर का एक एरियल व्यू दिखाती हैं। दूरी पर बिग बैन, लंदन ब्रिज सब नज़र आता है और नदी में चलते स्टीमर्स भी। जब-जब हम फोटो ज़ोन के निकट आते थे तो एक उद्धोष होता था कि अब आपका फोटो लिया जा रहा है। जब पूरा चक्र कर बाहर निकले तो स्क्रीन पर सबकी फोटो स्क्राल होती नज़र आती हैं कुछ पाऊँड देकर वह तस्वीर खरीदी जा सकती है। हमने कैमरा में उस स्क्रालिंग तस्वीर को कैद करना चाहा परंतु वो तब तक आंखों से हटा दी गई, और तस्वीरें आ गई। पूरा काॅमर्शियल सिस्टम है। चालाकी से फोटो नहीं ले सकते।

टेमस नदी पर लंदन काऊंटी काऊंसल और वैस्टमिन्सटर ब्रिज पर घूमते हुए

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