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Why this book- Safarnama

आमुख

वैसे तो अनगिनत यात्रा  वृतांत पर पुस्तकें उपलब्ध हैं  इस दुनिया के  मायामय लुभावने बाजार में, परन्तु एक भारतीयता में डूबी कलम, जिसे भारतीय दर्शन और संस्कृति से बेहद लगाव है, द्वारा लिखित और विभिन्न देशों की यात्राओं में झलकते जीवन को दर्शाती, ये पुस्तक अपने आप में अनूठी है ।

पुस्तक में लेखिका कहीं कहीं विदेशियों का अनुकरण करने को कहती है, पर ज्यादातर वह भारतीयों की सहिष्णुता, मेहमानवाजी, दरियादिली और दूसरे के लिए खुद को मिटाने की बात करती नजर आती हैं। ‘मैं नहीं तुमयही भारतीय शास्त्रों का सार है, जो वह दुनिया के समृद्ध देशों में कॉन्फरेंसों के जरिये, लोगों में टटोलती है, और इस भारतीय दर्शन के मापदंड पर तोलती नजर आती हैं । फिर अन्त में भारत को ही पुण्य भूमि करार देती हैं। आक्सफर्ड जैसे विश्व प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी में, भारत के आध्यात्मिक पर्व कुंभ मेला की चर्चा कर, वह उस ईसाई प्रधान देश में भी हिन्दुत्व की ऑल इन्कलूसिव धारणा को उजागर करती हैं।                    

यह पुस्तक क्यों

मुझे हमेशा से ही यह महसूस हुआ है कि  यात्रा हमें बहुत कुछ सीख दे जाती है, सहज रुप में।जब हम अपने कम्फर्ट ज़ोन ( आराम ग्रह) से निकल कर बाहर की दुनिया में कदम रखते हैं, तो बहुत से लोगों के सम्पर्क में आते है। कुछ नई संस्कृति और सभ्यता से रुबरु होते है,  नए खान-पान देखते और चखते हैं , या यू कहें तो बस एक अनजान शहर में सांस लेते हैं और survive कर पाते हैं । यह सब अपने आप ही हो जाता है बस खुद को उस वातावरण में खुला छोड़ना होता है। हां, शाकाहारी होने के नाते कुछ बंधन हमेशा रहते हैं ,पर तभी तो जब कुछ दिन बिताने पर कहीं अपने देश का खाना कोई आपको परोसता है तो जी चाहता है कि उस पर जान लुटा दें।

यात्राओं ने जीवन का जो आईना मुझे दिखाया उससे मैंने खुद को परिष्कृत पाया। अपने को जीवन में ज्यादा Adabtable (अनुकरणीय)पाया ।यात्राओं से मुझे उन छोटी चीजों, व्यक्तियों या कार्यों के प्रति अहमियत रखने की सीख मिली जिन्हें हम ज्यादातर नजर अन्दाज कर जाते हैं ।कुछ जगह ऐसा महसूस हुआ कि हम भारतीय बेहतर हैं अन्य कई जगह विदेशियों की बातें अनुकरणीय लगीं। इन अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के दौरान हुई यात्राओं ने मुझे अपने कोकून (स्वयं निर्मित जाल) से बाहर आने में मदद की और मैं अब जीवन के विभिन्न आयामों को समझने लगी हॅू। वैसे देखा जाए तो दुनिया के महान लोगों की आत्मकथा पढ़ने से यह दृढ़ होता है कि जीवन यात्रा में यात्राओं का अहम स्थान है। 19वीं शताब्दी के महान विचारक दार्शनिक जिन्होंने अपने वक्तव्य से पुरी दुनिया को हिला दिया था, स्वामी विवेकानंद, उन्होंने भी 12 वर्ष तक परिवा्रजक (घुमक्कड) रहकर देश भर में भ्रमण किया। जिन्दगी का मर्म विभिन्न देश काल और परिस्थिति में रहने से, अति सूक्ष्मता से समझ में आता है। मैंने यह महसूस कि या कि सम्मेलन यात्राओं से मेरी सोच को एक विस्तार और व्यापक दिशा मिली। अपने traditional mindset (पूर्वाग्रहों) से बाहर निकल और भी सोचने को मिला और फिर  तुलना कर इस भारत की भूमि जो पुण्यों के  फल से ही प्राप्त होती है, उस पर रहने का सौभाग्य मिलता है, ऐसा मेरा विश्वास दृढ़ हुआ। इस पुस्तक में ऐसे ही संस्मरण शामिल किये गए हैं, जो मुझे विभिन्न देशों की यात्राओं में मिले। सम्मेलन में शोध पत्र प्रस्तुति कर मुझे वहाँ के लोगों का रहन सहन और उनकी संस्कृति को निकटता से जानने का मौका मिला। कुछ कड़वे तथा कुछ मीठे अनुभव हुए, जिन्हें मैं इस पुस्तक में पिरोकर उन सभी अपनों से जुड़ सकूंगी जो हर दिन को एक transformation (परिवर्तन) की दिशा में उठाया गया कदम मानते हैं। वास्तव में जीवन का मतलब ही कल से आज बेहतर होते हुए उस पूर्णता को प्राप्त होना है।

‘भारतीयता’यानि संस्कृति की सनातन यात्रा का यायावर । इसी खोज में मेरी जो विदेश की यात्राएँ हुई उनका सचित्र विवरण इस पुस्तक में किया गया है। ‘भा’ का अर्थ प्रकाश यानि प्रकाश में रत, जिसका आत्मप्रकाश उसे तो आलौकित करता ही है , दूसरे देश भी जहाँ -जहाँ इसके प्रतिनिधि पहुंचे, आलोकित हो जाते है। भारतीयता को ऋषि मुनियों ने संजोया और आम आदमी, गृहस्थी ने इसे आत्मसात किया है, जो लोक जीवन के कण- कण में समाहित है आज। हमारे पर्वो,  पूजा अनुष्ठानों में,  रीति रिवाजों में,  शेाक- हर्ष में,  और यहाँ तक कि हमारे खान-पान में इस भारतीयता की निधि ने अखंड छाप छोडी़ है। इन्हीं सब घटकों को खेाजती मैं और मेरा सफरनामा, यह पुस्तक बन गया जो वास्तव में एक सनातन यात्रा का भी प्रारूप है।

भारत कोई 100 वर्षो से तो है नहीं सदियों पहले विष्णु पुराण में भी इसका जिक्र आया है। मुझे, कहीं तो भारत से सुदूर बसे भारतीयों में यह भारतीयता काफी पल्लवित होती नजर आई जैसे लॉस ऐंजिलिस में, परन्तु शिकागो में इन जडों का ढीलापन महसूस हुआ, जहां 50 डालर के लिए मुझे मेरी होस्ट ने मुझे रोने पर विवश कर दिया । पर भारतीयता की व्यापकता में कोई कमी नहीं है, यह बात कई देशों की यायावरी के दौरान मुझे समझ आई।

इस पुस्तक से एक और मक्सद सिद्ध होता है अनजाने में, वो है मंत्र की महता का । हर काम शुरू करने से पहले मेरी मंत्र जपने की आदत। यदि मंत्र में हमें विश्वास हो तो चाहे हम यंत्रवत ही उसे दोहराते जाएं, आखिर में इसका प्रभाव अवश्य पडेगा । क्योंकि दिव्य नाम में महान शक्ति होती है। यह हमारे विभिन्न विचारों के प्रतिरोध में सहायता करता है । सभी आध्यात्मिक गुरूओं के अनुसार आध्यात्मिक अनुभूति या भौतिक समद्धि की प्राप्ति के लिए जप साधना सर्वश्रेष्ठ साधनों में से एक है ।

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